तुलसी जयंती पर तुलसीदास का एक भजन
यह भजन सुनें -
तुलसी जयंती पर तुलसी स्मरण यहाँ भी ।
लेबल: तुलसी जयंती
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प्रस्तुतकर्ता हिमांशु । Himanshu पर 11:06 AM | 6 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
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प्रस्तुतकर्ता हिमांशु । Himanshu पर 6:07 PM | 7 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: आडियो, कविता, मेरी आवाज में कविता
प्रस्तुतकर्ता हिमांशु । Himanshu पर 7:20 AM | 11 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: मेरी आवाज में कविता
कभी आडियो फाइल अपने ब्लॉग पर नहीं लगायी थी । आज जिस कविता को सच्चा शरणम पर पोस्ट किया उसे अपनी आवाज में रिकॉर्ड भी किया था । सोचा इसी बहाने इस पोस्टिंग को भी आजमा लूँ । यह सुनिये मेरी आवाज में मेरी कविता "महसूस करता हूँ, सब तो कविता है" जिसे आज मैंने अपने ब्लॉग सच्चा शरणम पर पोस्ट किया है ।
प्रस्तुतकर्ता हिमांशु । Himanshu पर 9:48 PM | 5 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: आडियो
मैं स्टेशन के पास का
वाहन-स्टैण्ड हूं
जहां निज-मन के वाहन
खड़े करने के लिये
अपनी मुस्कराहट के
चमकते सिक्कों से राहगीर
मेरे प्रेम और दायित्व के टिकट
खरीद लेता है ।
फिर पूरे कर अपने काम
लौटता है
और अपना मन-वाहन
लेकर उड़ जाता है ।
बहुत-सी ऐसी ही
मुस्कराहटों के लिये
मैंने बेच दिये हैं
अपने सौहार्द्र और प्रेम के क्षण ।
अब कविता प्रविष्टियां इस चिट्ठे पर भी : सच्चा शरणम
प्रस्तुतकर्ता हिमांशु । Himanshu पर 2:46 PM | 9 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: कविता
हर शख्स अपने साथ मैं खुशहाल कर सकूं
मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं ।
फैली हैं अब समाज में अनगिन बुराइयाँ
है लालसा कि बद को मैं बेहाल कर सकूँ।
फेकूँ निकाल हिय के अन्धकार द्वेष को
कटुता के जी का आज मैं जंजाल कर सकूँ।
है प्रार्थना कि नाथ वृहद शक्ति दो हमें
चेहरा बुराइयों का मैं विकराल कर सकूँ ।
प्रस्तुतकर्ता हिमांशु । Himanshu पर 4:04 PM | 17 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
लेबल: कविता
गुजरता था मैं जब भी दरवाजे से
खुला रहता था वह,
खड़ा रहता था कोई
मेरी प्रतीक्षा में,
दरवाजे के भीतर से
एक मुस्कराहट चीरती भीड़ को
चली आती थी मेरे पास,
मैं अवश उस मुस्कुराहट से बँधा
रूप-मग्न चलता जाता था
अपने भीतर
एक उजास का अनुभव करते हुए।
उस समय मेरे मन की स्लेट पर
किसी चेहरे की लकीर होती
चेतना में निर्झर का संगीत होता
और दृष्टि में उसका सम्मोहन ।
गुजरता हूँ मैं अब भी दरवाजे से
खुला रहता है वह अब भी,पर
खड़ा नहीं रहता कोई
मेरी प्रतीक्षा में
अपनी मुस्कराहट के साथ ।
दिल में उठ जाती है कसक,
कसकने लगता है हृदय
हर उस चोट की तरह
जो सिहर उठती है
हर पूरबी हवा के झोंके से।
मेरी आँखों में सूनापन
आ कर ठहर गया है।
सोचता हूँ,
आज कोई होता भी
तो कैसे देख पाता उसे ?
पहरा है मेरी आँखों के सामने
बहुत-सी आँखों का
लोग, सीमेंट और पत्थरों से
बनी दीवारों की तरह
हमारी आँखों के बीच आ खड़े हैं।
प्रस्तुतकर्ता हिमांशु । Himanshu पर 4:30 AM | 7 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
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