Tuesday, July 28, 2009

तुलसी जयंती पर तुलसीदास का एक भजन

यह भजन सुनें -




तुलसी जयंती पर तुलसी स्मरण यहाँ भी ।

Sunday, June 21, 2009

तुम्हारा स्पर्श (ऑडियो)



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Wednesday, April 15, 2009

कहाँ कहाँ डोलूँगा (मेरी आवाज में कविता)

Thursday, April 9, 2009

मेरी आवाज में मेरी कविता

कभी आडियो फाइल अपने ब्लॉग पर नहीं लगायी थी । आज जिस कविता को सच्चा शरणम पर पोस्ट किया उसे अपनी आवाज में रिकॉर्ड भी किया था । सोचा इसी बहाने इस पोस्टिंग को भी आजमा लूँ । यह सुनिये मेरी आवाज में मेरी कविता "महसूस करता हूँ, सब तो कविता है" जिसे आज मैंने अपने ब्लॉग सच्चा शरणम पर पोस्ट किया है ।

Thursday, March 12, 2009

मैं स्टेशन के पास का वाहन-स्टैण्ड हूं

मैं स्टेशन के पास का
वाहन-स्टैण्ड हूं
जहां निज-मन के वाहन
खड़े करने के लिये
अपनी मुस्कराहट के
चमकते सिक्कों से राहगीर
मेरे प्रेम और दायित्व के टिकट
खरीद लेता है ।
फिर पूरे कर अपने काम
लौटता है
और अपना मन-वाहन
लेकर उड़ जाता है ।

बहुत-सी ऐसी ही
मुस्कराहटों के लिये
मैंने बेच दिये हैं
अपने सौहार्द्र और प्रेम के क्षण ।

अब कविता प्रविष्टियां इस चिट्ठे पर भी : सच्चा शरणम

Wednesday, February 4, 2009

मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं

हर शख्स अपने साथ मैं खुशहाल कर सकूं
मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं ।

फैली हैं अब समाज में अनगिन बुराइयाँ
है लालसा कि बद को मैं बेहाल कर सकूँ।

फेकूँ निकाल हिय के अन्धकार द्वेष को
कटुता के जी का आज मैं जंजाल कर सकूँ।

है प्रार्थना कि नाथ वृहद शक्ति दो हमें
चेहरा बुराइयों का मैं विकराल कर सकूँ ।

Tuesday, February 3, 2009

कैसे देख पाता ?

गुजरता था मैं जब भी दरवाजे से
खुला रहता था वह,
खड़ा रहता था कोई
मेरी प्रतीक्षा में,
दरवाजे के भीतर से
एक मुस्कराहट चीरती भीड़ को
चली आती थी मेरे पास,
मैं अवश उस मुस्कुराहट से बँधा
रूप-मग्न चलता जाता था
अपने भीतर
एक उजास का अनुभव करते हुए।
उस समय मेरे मन की स्लेट पर
किसी चेहरे की लकीर होती
चेतना में निर्झर का संगीत होता
और दृष्टि में उसका सम्मोहन ।

गुजरता हूँ मैं अब भी दरवाजे से
खुला रहता है वह अब भी,पर
खड़ा नहीं रहता कोई
मेरी प्रतीक्षा में
अपनी मुस्कराहट के साथ ।
दिल में उठ जाती है कसक,
कसकने लगता है हृदय
हर उस चोट की तरह
जो सिहर उठती है
हर पूरबी हवा के झोंके से।
मेरी आँखों में सूनापन
आ कर ठहर गया है।

सोचता हूँ,
आज कोई होता भी
तो कैसे देख पाता उसे ?
पहरा है मेरी आँखों के सामने
बहुत-सी आँखों का
लोग, सीमेंट और पत्थरों से
बनी दीवारों की तरह
हमारी आँखों के बीच आ खड़े हैं।

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