Thursday, March 12, 2009

मैं स्टेशन के पास का वाहन-स्टैण्ड हूं

मैं स्टेशन के पास का
वाहन-स्टैण्ड हूं
जहां निज-मन के वाहन
खड़े करने के लिये
अपनी मुस्कराहट के
चमकते सिक्कों से राहगीर
मेरे प्रेम और दायित्व के टिकट
खरीद लेता है ।
फिर पूरे कर अपने काम
लौटता है
और अपना मन-वाहन
लेकर उड़ जाता है ।

बहुत-सी ऐसी ही
मुस्कराहटों के लिये
मैंने बेच दिये हैं
अपने सौहार्द्र और प्रेम के क्षण ।

अब कविता प्रविष्टियां इस चिट्ठे पर भी : सच्चा शरणम

9 टिप्पणियाँ:

तीन बार पढा, तब जाकर पूरी तरह समझ में आई.
बेहतरीन लिखा है आपने.
मुस्कराहट के चमकते सिक्के और प्रेम और दायित्व के टिकट !!!
क्या बात है !!

March 12, 2009 3:23 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

March 12, 2009 4:13 PM  

हिमांशु जी कविता पसंद आई आपकी ....

March 12, 2009 5:30 PM  

बहुत सुंदर लिखा आपने...

March 12, 2009 8:25 PM  

वाहन-स्टैण्ड से भी आपने कविता गढ़वा ली. सच ही कहा है. कवी को चहुँ और कविता ही दिखती है. सुन्दर प्रस्तुति. आभार.

March 12, 2009 10:05 PM  

मैं स्टेशन के पास का
वाहन-स्टैण्ड हूं
जहां निज-मन के वाहन
खड़े करने के लिये
अपनी मुस्कराहट के
चमकते सिक्कों से राहगीर
मेरे प्रेम और दायित्व के टिकट
खरीद लेता है ।
फिर पूरे कर अपने काम
लौटता है
और अपना मन-वाहन

लेकर उड़ जाता है ....बहुत सुन्दर कविता....!!

yugm me bhi pdha aapko wo bhi bhot acchi kavita hai....!!

March 14, 2009 12:12 AM  

वाहन स्टैंड पर भी ऐसी सुन्दर अभिव्यक्ति हो सकती है, पढने के बाद ही समझ आया.

सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

March 17, 2009 8:09 AM  

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Jai..Ho...

March 24, 2009 11:24 AM  

Ek bhaut hi achhi kavita man vahan ko lekar shabdon ka chayan bhi bhaut achha laga

May 16, 2009 4:35 PM  

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