ओ प्रतिमा अनजानी
ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
कहता हूँ निज बात सुहानी, सुन लो ना ।
डूबा रहता था केवल जीवन की बोध कथाओं में
अब खोया हूँ मैं रूप-सरस की अनगिन विरह-व्यथाओं में
सत्य अकल्पित-मधुरित-सुरभित, अन्तरतम में हर पल गुंजित
ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
मुझ पर हो कर सदय, मुझे ही चुन लो ना ।
संसार-सुखों की छाया का आस्वाद नहीं पाना मुझको
हो जहाँ नहीं तेरी ध्वनि वो संवाद नहीं पाना मुझको
हे प्रात-गीत,हे सुहृद मीत, मन-वीणा के तारों-सी झंकृत
ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
हों हम एकाकार , स्नेह के स्वप्न यही तुम बुन लो ना।
कहता हूँ निज बात सुहानी, सुन लो ना ।
डूबा रहता था केवल जीवन की बोध कथाओं में
अब खोया हूँ मैं रूप-सरस की अनगिन विरह-व्यथाओं में
सत्य अकल्पित-मधुरित-सुरभित, अन्तरतम में हर पल गुंजित
ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
मुझ पर हो कर सदय, मुझे ही चुन लो ना ।
संसार-सुखों की छाया का आस्वाद नहीं पाना मुझको
हो जहाँ नहीं तेरी ध्वनि वो संवाद नहीं पाना मुझको
हे प्रात-गीत,हे सुहृद मीत, मन-वीणा के तारों-सी झंकृत
ओ प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
हों हम एकाकार , स्नेह के स्वप्न यही तुम बुन लो ना।
लेबल: कविता





Kishore Choudhary said...
himanshu , really very sweet poem . congrets
February 1, 2009 3:29 PM
Mrs. Asha Joglekar said...
बहुत कोमल भाव जो आप के वय के अनुरूप ही हैं .
February 1, 2009 3:35 PM
Shikha Deepak said...
आपकी कविता बहुत सुंदर है। प्रेम और कोमलता के साथ साथ आध्यात्मिकता का भाव भी है। शब्दों का बहुत सुंदर संयोजन किया है।
February 1, 2009 4:04 PM
Mired Mirage said...
बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती
February 1, 2009 4:14 PM
विवेक सिंह said...
इतने अनुरोध पर तो बात मान ली जानी चाहिए .
पर अनजानी प्रतिमा तक बात पहुँचना जरूरी है , हम तक पहुँचे या न पहुँचे !
साधु साधु !
February 1, 2009 6:08 PM
Arvind Mishra said...
हों हम एकाकार , स्नेह के स्वप्न यही तुम बुन लो ना।
तथास्तु !
February 1, 2009 7:01 PM
Udan Tashtari said...
बहुत बेहतरीन!!! वाह!!
February 1, 2009 11:07 PM
राज भाटिय़ा said...
मन भावन, उतम , सुंदर.
धन्यवाद
February 2, 2009 1:16 AM
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
बहुत मधुर!
February 2, 2009 6:58 AM
हिमा अग्रवाल said...
भावपूर्ण कविता। बधाई।
February 2, 2009 2:46 PM
Pratap said...
बहुत ही सुंदर कविता
February 2, 2009 5:29 PM
SANJEEV MISHRA said...
संसार-सुखों की छाया का आस्वाद नहीं पाना मुझको
हो जहाँ नहीं तेरी ध्वनि वो संवाद नहीं पाना मुझको
atyant sundar.
February 2, 2009 7:48 PM
विनय said...
ज़रूर पढ़ें: हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख
February 2, 2009 10:05 PM