Sunday, February 1, 2009

ओ प्रतिमा अनजानी

प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
कहता हूँ निज बात सुहानी, सुन लो ना

डूबा रहता था केवल जीवन की बोध कथाओं में
अब खोया हूँ मैं रूप-सरस की अनगिन विरह-व्यथाओं में
सत्य अकल्पित-मधुरित-सुरभित, अन्तरतम में हर पल गुंजित
प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
मुझ पर हो कर सदय, मुझे ही चुन लो ना

संसार-सुखों की छाया का आस्वाद नहीं पाना मुझको
हो जहाँ नहीं तेरी ध्वनि वो संवाद नहीं पाना मुझको
हे प्रात-गीत,हे सुहृद मीत, मन-वीणा के तारों-सी झंकृत
प्रतिमा अनजानी, दिल की सतत कहानी
हों हम एकाकार , स्नेह के स्वप्न यही तुम बुन लो ना।

13 टिप्पणियाँ:

himanshu , really very sweet poem . congrets

February 1, 2009 3:29 PM  

बहुत कोमल भाव जो आप के वय के अनुरूप ही हैं .

February 1, 2009 3:35 PM  

आपकी कविता बहुत सुंदर है। प्रेम और कोमलता के साथ साथ आध्यात्मिकता का भाव भी है। शब्दों का बहुत सुंदर संयोजन किया है।

February 1, 2009 4:04 PM  

बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती

February 1, 2009 4:14 PM  

इतने अनुरोध पर तो बात मान ली जानी चाहिए .
पर अनजानी प्रतिमा तक बात पहुँचना जरूरी है , हम तक पहुँचे या न पहुँचे !
साधु साधु !

February 1, 2009 6:08 PM  

हों हम एकाकार , स्नेह के स्वप्न यही तुम बुन लो ना।
तथास्तु !

February 1, 2009 7:01 PM  

बहुत बेहतरीन!!! वाह!!

February 1, 2009 11:07 PM  

मन भावन, उतम , सुंदर.
धन्यवाद

February 2, 2009 1:16 AM  

बहुत मधुर!

February 2, 2009 6:58 AM  

भावपूर्ण कविता। बधाई।

February 2, 2009 2:46 PM  

बहुत ही सुंदर कविता

February 2, 2009 5:29 PM  

संसार-सुखों की छाया का आस्वाद नहीं पाना मुझको
हो जहाँ नहीं तेरी ध्वनि वो संवाद नहीं पाना मुझको
atyant sundar.

February 2, 2009 7:48 PM  

February 2, 2009 10:05 PM  

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