Tuesday, January 27, 2009

वह आँसू कह जाते हैं

मेरा प्रेम
कुछ बोलना चाहता है ।
कुछ शब्द भी उठे थे, जिनसे
अपने प्रेम की सारी बातें
तुमसे कह देने को
मन व्याकुल था ,
पर जबान लड़खडा गयी।
अन्दर से आवाज आयी
"कोई बाँध सका है
की तुम चले हो बांधने
प्रेम को, शब्दों में ।
ठहर गया मैं ।

प्रश्न था, प्रेम बोलना चाहता है,
अभिव्यक्त होना चाहता है,
पर प्रेम के पास तो कोई भाषा ही नहीं-
मौन है प्रेम ।
तो ऐसी दुविधा में उलझकर
पोर-पोर रो उठे,
आंखों से आंसू झरें
तो आश्चर्य क्या ?
आंसू झर पड़ते हैं, जब
गहरी हो जाती है कोई अनुभूति-
प्रेम की अनुभूति - शब्दातीत।

राह मिल गयी......
जो शब्द नहीं कह पाते
वह आँसू कह जाते हैं।

6 टिप्पणियाँ:

जो शब्द नहीं कह पाते
वह आँसू कह जाते हैं।

-ये राह नहीं मित्र--बोध की प्राप्ति है. आप लगभग गौतम बुद्ध टाइप के हुए. :)

बेहतरीन रचना-बधाई.

January 27, 2009 5:25 AM  

प्रेम कि कोई भाषा तो नहीं है परंतु अभिव्यक्ति के रूप ना जाने कितने हैं. बहुत सुंदर. आभार.

January 27, 2009 8:58 AM  

प्रेम अभिव्यक्ति के रास्ते तलाश कर लेता है ..चाहे वह लफ्ज़ हो या आंसू .सुंदर लगी आपकी यह रचना

January 27, 2009 11:29 AM  

गज़ब कर दिया जी !

January 27, 2009 4:42 PM  

राह मिल गयी......
जो शब्द नहीं कह पाते
वह आँसू कह जाते हैं।
हिमांशु भाई बहुत सुंदर.
धन्यवाद

January 27, 2009 10:13 PM  

ऐसी कविता पर क्या टिप्पड़ी दी जा सकती है ! सुंदर !

January 29, 2009 2:24 PM  

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